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सशक्त हस्ताक्षर के शानदार 2 साल: जुटे मीडिया और साहित्य जगत के दिग्गज, याद आए विभु कुमार

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रायपुर । सशक्त हस्ताक्षर ने अपने दो वर्ष सफलता पूर्वक पूरे कर लिए हैं । इस अवसर पर पत्रिका का दूसरा स्थापना दिवस समारोह शनिवार, 12 नवंबर को आयोजित किया गया जिसमे प्रदेश के जाने माने साहित्यकारों एवं पत्रकार साथियों ने शिरकत की ।


पूर्व आईएएस सुशील त्रिवेदी की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में ‘सोशल मीडिया के दौर में पत्रकारिता की चुनौतियां’ विषय पर एक परिचर्चा की गयी जिसमें वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार सतीश जायसवाल तथा नथमल शर्मा ने अपने विचार श्रोताओं के सामने रखे ।

सतीश जायसवाल ने कहा कि “युवा पीढ़ी के हाथ में मोबाईल नामक यंत्र जब से आया है वे सभी पढ़ने लिखने से दूर हो गये हैं। उन्हें सोशल मीडिया पर इंस्टेन्ट इन्फॉर्मेशन चाहिए । उसकी सत्यता और प्रमाणिकता से कोई सरोकार ना रखते हुए उन्हे बस अपडेटेड रहना है । पहले से अख़बार पढ़ते आ रहे पाठक ही अखबारों को ख़बरों का मूल स्रोत मानते है । बाकियों में अख़बार के लिए दिलचस्पी ना के बराबर है ।


यही कारण है कि जहां पहले पचास लोगों की टीम अख़बार निकालती थी अब वही काम चार पांच लोगों से करा लिया जा रहा है । इसी वजह से अख़बार के कंटेंट में भी लगातार गिरावट आ रही है ।” उन्होने यह भी कहा कि “देखा देखी ट्रेंड फ़ॉलो करने वाले अपनी आगे की पीढ़ी को क्या सीख दे रहे हैं ये वो खुद नहीं जानते।”



करीब डेढ़ घंटे चली दिलचस्प परिचर्चा में नथमल शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किये । सतीश जायसवाल से सहमत होते हुये उन्होंने कहा “रचना ही बचना है” उन्होंने कहा “साहित्य से दूरी अपनी जड़ों से दूर जाने के समान है । जब तक आप अच्छा पढोगे नहीं तब तक आप मौलिक विचारों के स्वामी नहीं बन सकते ।”


उन्होंने आगे कहा “सोशल मीडिया होता क्या है ? क्या अख़बार सोशल नहीं ? अन-सोशल हैं ? सोशलिज़्म का पहला पाठ हमें अखबारों ने ही पढ़ाया हैं हम उससे किसी क्षणिक इनफार्मेशन देने वाले ज़रिये की तुलना करें भी क्यों ?” उन्होंने कहा की पत्रकरिता के समक्ष खड़ी इस चुनौती को स्वीकार करना ही इसके समाधान का पहला कदम है ।


कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. सुशील त्रिवेदी ने कहा “सोशल मीडिया पर मैं 1986 से काम कर रहा हूंँ। शुरुआती दौर से लेकर अब तक के सफर तक मेरी नज़र है। 1920 में यंग इंडिया में कही गयी गांधी जी की बात आज भी प्रासंगिक है । ऐसी प्रासंगिकता मोबाइल पर मिलने वाले सोशल मीडिया के नित पुराने होते ट्रेंड्स के बस की बात नहीं ।”


अपने उद्बोधन में उन्होने भारत के पहले अख़बार उद्दंड मार्तण्ड का उल्लेख करते हुए उन्होने कहा की उस समय के अख़बार में लिखी बातें आज भी प्रासंगिक हैं । उन्होंने कहा की अख़बार कभी पुराना नहीं होता । अख़बार के सामने हमेशा से चुनौतियां आती रही हैं। सोशल मीडिया की चुनौती क्षणिक है ।

बहुत याद आए विभु कुमार
कार्यक्रम में सशक्त हस्ताक्षर के जनक, विभु कुमार के बाारे में सतीश जायसवाल ने कहा- विभु साठोत्तर दशक के एक सशक्त युवा लेखक, कहानीकार, रंग कर्मी और सहित्यिक पत्रकार रहे। साहित्य और पत्रकारिता 80 के दशक तक साथ चली ।


इसके सशक्त स्तंभ विभु रहे। उन्होंने 23 साल की छोटू आयु में एक लघु पत्रिका रायपुर जैसे शहर से शुरु की थी। उस वक्त की दिल्ली से निकलने वाली तमाम पत्रिकाओं में उनके लेख और कहानियां छपा करती थीं। धर्म युग, रविवार, जैसी पत्रिकाओं उनकी रचनाएं छपा करती थीं।

धर्म वीर भारती जैसे साहित्यकार उस वक्त धर्मयुग के संपादक थे। ये पत्रिका पूरे भारत में पसंद की जाती थी। इसमें कहानी छपना बड़ी बात होती थी। सतीश जायसवाल ने आगे कहा – मुझे याद है कि विभु ने कुछ विवादों को जन्म दिया था। उन दिनों एक लेखक हुए बिलासपुर के श्रीकांत वर्मा जो दिल्ली में रहा करते थे। दिल्ली में रहने वाले लेखकों को बड़ा माना जाता रहा है। उनकी कहानी आई यात्रा।


उसके बाद विभु कुमार की कहानी छपी यात्रा-शवयात्रा। साहित्य पढ़ने वालों के बीच बहस शुरू हो गई कि दोनों में से कौन सी कहानी बेहतर है। इसके बाद नारी सशक्तिकरण पर विमल मित्र ने लेख लिखे। जो िवभु को पसंद नहीं आए इस पर उन्हें आपत्ति थी, इसके बाद ये आपत्ति उन्होंने उस लेख की प्रतियां सरेराह जलाकर जताई। ये अभिव्यक्ति के आंदोलन का स्वरूप रहा।


डॉ सुशील त्रिवेदी ने कहा- विभु कुमार मेरे सहपाठी रहे हैं। 1958 में हायर सेंकडरी हमनें साथ पास की। मैं साइंस कॉलेज गया और विभु छत्तीसगढ़ कॉलेज पढ़ने गए। उस वक्त से ही विभु ने लिखना शुरू कर दिया था। विभु को एक विरोध करने वाले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। लेकिन उनकी रचना और रंगकर्म आला दर्ज का रहा। उन्होंने अविभाजित मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ का पहला नुक्कड़ नाटक किया। जय स्तंभ में ये नाटक खेला गया। इसमें विभु ने भिखारी का रोल किया था । लोग समझ नहीं पाए कि नाटक हो रहा है।

डॉ सुशील ने कहा- उन्होंने देशभर के तमाम बड़े रंग कर्मियों को रायपुर बुलाया। जैसे अमोल पालेकर, स्मिता पाटिल, अमरिश पुरी, ओम पुरी आदि। ये सभी िवभु के मित्र रहे। वो चाहते तो रायपुर से बाहर जा सकते थे, मगर उन्हें रायपुर से प्रेम था। यह प्रेम उनकी पत्रकारिता में नजर आता था। 1990 से 95 के दशक दैनिक भास्कर रायपुर में पकड़ बना रहा था। उस वक्त रमेश नैयर संपादक थे।

विभु हर रविवार को एडिट पेज पर शहरनामा कॉलम लिखा करते थे। तीन साल तक शहर नामा कॉलम लिखकर दैनिक भास्कर जैसे अखबार को स्थापित होने में मदद की। सुभाष मिक्षा ने कहा- विभु कुमार को याद करते हुए कहा कि वह एक अलग ही किस्म के इंसान थे। ये बड़ा दुर्भाग्य है कि कथाकार के कार्यक्रम में चंद लोग पहुंचे दूसरी तरफ कथावाचक के कार्यक्रम लाखों की भीड़ जुटी हुई है।

कार्यक्रम के अंत में श्रोताओं का आभार व्यक्त करते हुए आज की जनधारा के संपादक सुभाष मिश्रा ने कहा कि यह बहुत दुर्भाग्य की बात है कि एक कथकार के कार्यक्रम में चंद लोग पहुंचे दूसरी ओर एक कथा वाचक के कार्यक्रम में लाखों की भीड़ जुट गयी। कार्यक्रम का सफल संचालन पूर्व बैंक अधिकारी एवं रंगकर्मी शकील साजिद ने किया । उन्होंने सशक्त हस्ताक्षार के संपादक निश्चय कुमार को सफल आयोजन एवं परम बुद्धिजीवियों को आमंत्रित करने के लिए साधुवाद दिया ।