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छत्तीसगढ़ के इस देवी मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित, साया भी नहीं देते पड़ने, जानिए वजह

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महासमुंद. छत्तीसगढ़ में वैसे तो माता रानी के अनेकों मंदिर हैं, लेकिन नवरात्रि के दौरान आज हम एक ऐसे मंदिर की बात करेंगे, जहां महिलाओं का प्रवेश पूरी तरह वर्जित है. मान्यता है कि माता भूगर्भ से प्रकट हुई हैं. हम छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिला मुख्यालय से 7 किमी दूर तुमगांव रोड पर कौंदकेरा गांव स्थित शक्ति पीठ मां सोनई और रुपई माता की बात कर रहे हैं. कहा जाता है कि रिश्ते में दोनों माता बहनें है. इस मंदिर की अनोखी परंपरा है. कहा जाता है कि माता के दर्शन मात्र से सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है. इसलिए बहुत दूर-दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. खासतौर पर नवरात्र के समय श्रद्धालुओं की भीड़ देखने मिलती है.

सदियों से इस मंदिर की परंपरा है कि यहां कोई महिला प्रवेश नहीं करती. बाकायदा मंदिर के बाहर इसकी जानकारी पोस्टर लगाकर दी गई है. इस मंदिर में नवरात्र में मनोकामना की ज्योत जलाई जाती है. मंदिर के इस परंपरा के चर्चे आसपास के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में है. प्रतिदिन माता का श्रृंगार करने वाले केशव साहू और पूनम चंद्राकर बताते हैं कि शक्ति पीठ मां सोनई रुपई माता की पूज्य स्थल वर्षों पुराना है. जिस स्थान में माता मां सोनई रुपई का मंदिर स्थित है, वहां सदियों पहले घनघोर जंगल था.

200 साल से अधिक पुराना है शक्ति पीठ का इतिहास
वैसे तो इस स्थान पर मंदिर बने ज्यादा दिन नहीं हो रहा है लेकिन स्थल का इतिहास काफ़ी प्राचीन है. गांव के लोग कहते हैं कि कई पीढ़ियां निकल गई और माता के प्रति आस्था और वर्षों से चली आ रही परंपरा आज भी जारी हैं. उन्होंने बताया कि सिर्फ 10 वर्ष से 12 वर्ष तक की बच्चियां ही माता के मंदिर में प्रवेश कर सकती है. नवरात्र में मनोकामना की ज्योति जलाई जाती है तो नवकन्या के रूप में छोटी लड़कियों को भोज कराया जाता है.

वर्षों पुरानी परंपरा, महिलाओं ने रखा बरकरार मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित होने की परंपरा का यहां की महिलाएं भी सम्मान करती हैं. गांव की महिलाओं ने बताया कि परंपरा क्यों चल रही है, यह तो उन्हें नहीं मालूम, लेकिन उन्हे निभाने में कोई ऐतराज नहीं है.