हस्ताक्षर न्यूज. क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर मुंबई से सीधे बस्तर के एयरपोर्ट पर उतरे। ये कोई सामान्य बात नहीं है। कारण यह है कि बस्तर को पूरे विश्व के साथ ही हिंदुस्तान के अनेक राज्य अब तक यह समझते रहे हैं कि बस्तर का दूसरा नाम नक्सलिज्म है। लेकिन सचिन तेंदुलकर ने बस्तर के घुर नक्सली इलाके छिंदनार पहुंचकर इस मिथ को खत्म करने की शुरुआत कर दी है।

भारत और छत्तीसगढ़ सरकार पिछले कुछ सालों से बस्तर को नक्सलमुक्त करने का जी तोड़ प्रयास कर रही हैं। पिछले एक साल में सैंकडों नक्सलियों ने बंदूक छोड़कर आम जीवन की राह पकड़ी है। जिस तरह सचिन अपने पूरे परिवार के साथ बस्तर पहुंचे उससे भारत के साथ ही पूरी दुनिया में एक सकारात्मक संदेश पहुंचा है। बस्तर का चित्रकोट जलप्रपात अमरीका और कैनेडा के नियाग्रा फॉल से कम नहीं है। सचिन का बस्तर आना टूरिज्म के लिहाज से भी एक नया कदम है। अब सरकार को इस दिशा में नई पहल करना चाहिए। बस्तर के पर्यटन को अब पूरे विश्व को दिखाने का वक्त आ चुका है। मेरी तो सरकार को यह सलाह है कि सचिन तेंदुलकर को बस्तर का ब्रांड एंबेसडर बना देना चाहिए। सबसे बड़ी बात यह है कि सचिन ने 50 सरकारी स्कूलों के खेल मैदान को गोद ले लिया है। इन मैदानों का वे डेवलपमेंट करने वाले हैं। बस्तर में खेल प्रतिभाओं की किसी भी तरह की कमी नहीं है। बस्तर का नौजवान हृष्ट-पुष्ट है। बस उसे सही दिशा दिखा्ने की जरूरत है।
हाल ही में बस्तर में ओलंपियाड हुआ। पिछले महीने खेलो इंडिया का आयोजन भी जगदलपुर में हुआ। बस्तर नई राह पकड़ रहा है। सरकार अपनी तरह से जो कर रही है वह तो उसका कर्तव्य ही है। लेकिन बस्तर को विकास की राह में आगे बढ़ाने के लिए वहां के मूलनिवासियों को भी आगे आना चाहिए तब ही बस्तर हिंदुस्तान के नक्शे में सूरज की तरह दमकने लगेगा।



























