स्काई वॉक: वरिष्ट पत्रकार समरेंद्र शर्मा की नजर से देखें sky walk……पर चढ़कर……
रायपुर शहर, जो कभी अपनी हरियाली और सहज जीवनशैली के लिए जाना जाता था, अब अंधाधुंध शहरी रूपांतरण की राह पर है। इसी क्रम में एक बहुचर्चित योजना है स्काई वॉक की, जो पिछले कई बरसों से बदनामी की इमारत के रूप में खड़ा है। अब करीब 38 करोड़ खर्च कर फिर से इसे बनाने की तैयारी है, जबकि पहले ही इस पर लगभग 60 करोड़ रुपये फूंके जा चुके हैं। शहर के बीचोंबीच, मुख्य चौक-चौराहों को जोड़ने बनाई जा रही यह संरचना पहली नजर में अत्याधुनिक और भव्य प्रतीत होती है। लेकिन जैसे ही इस योजना की गहराई में उतरते हैं, कई जमीनी सवाल उभरने लगते हैं। क्या वाकई रायपुर को स्काई वॉक की आवश्यकता है? क्या यह विकास की दिशा में एक ठोस कदम है या फिर शहरी सौंदर्यीकरण के नाम पर किया गया दिखावटी निवेश?
इस स्काई वॉक को बनाने के पीछे दलील दी जाती है कि पैदल यात्रियों को सड़क पार करने या ट्रैफिक से बचने के लिए एक वैकल्पिक ऊँचाई वाला मार्ग उपलब्ध कराना। ऐसा माना गया कि यह व्यवस्था शहर के भीड़भाड़ वाले इलाकों में राहत प्रदान करेगी। परंतु इस सोच में एक बुनियादी चूक यह रही कि रायपुर जैसे शहर में पैदल चलने वालों की संख्या बेहद सीमित है। लोग दोपहिया वाहनों, ऑटो, ई-रिक्शा या निजी वाहनों पर अधिक निर्भर रहते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या इतनी बड़ी राशि उन लोगों की सुविधा के लिए खर्च की जा रही है जो शायद ही कभी इसका उपयोग करेंगे?
इसके अलावा, रायपुर की जलवायु ऐसी नहीं है कि कोई व्यक्ति तेज धूप या बारिश में ऊँचाई तक सीढ़ियां चढ़कर स्काई वॉक पर चलना पसंद करे। गर्मी के महीनों में जब सड़कों पर चलना तक मुश्किल होता है, तब लोग स्वेच्छा से ऊँचाई चढ़ने का विकल्प क्यों चुनेंगे? वहीं दूसरी ओर, मॉल और एयरपोर्ट जैसे स्थानों पर जहाँ एस्केलेटर और एयर कंडीशनिंग की सुविधा होती है, वहाँ लोग ऊपर नीचे आते-जाते हैं।
तकनीकी रूप से देखा जाए तो दिल्ली के कश्मीरी गेट, मुंबई के घाटकोपर, या बैंगलोर के मेट्रो स्टेशन से जुड़े स्काई वॉक्स अपनी लोकेशन, ट्रैफिक वॉल्यूम और सार्वजनिक परिवहन से कनेक्टिविटी की वजह से सफल हैं। वहाँ स्काई वॉक न सिर्फ भीड़ को नियंत्रित करने का काम करते हैं, बल्कि रोजाना हजारों यात्रियों की जीवनरेखा भी हैं। इसके विपरीत रायपुर में स्काई वॉक की जगह, कनेक्टिविटी और उपयोगिता पर स्पष्टता का अभाव रहा है।
इसकी एक और आलोचना इसकी पारदर्शिता और जनभागीदारी की कमी को लेकर भी होती रही है। शहर की जनता को यह बताए बिना कि वास्तव में इसका उपयोग कौन करेगा, इसकी मंजूरी दे दी गई। अब जब इसकी उपयोगिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तब प्रशासन इसे किसी तरह पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है लेकिन मूल प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि क्या यह निवेश सही दिशा में किया गया है?
यदि इस स्काई वॉक को पूरी तरह से तोड़ना नीतिगत रूप से उचित न हो, तो इसे सिर्फ एक पैदल यात्री मार्ग मानने की बजाय एक सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और पर्यटन केंद्र के रूप में दोबारा गढ़ा जा सकता है।
पहला विकल्प हो सकता है कि इसे एक स्ट्रीट आर्ट गैलरी या “वॉकिंग म्यूजियम” में बदला जाए। देश-विदेश में कई शहरों ने अनुपयोगी पुलों या फ्लायओवर के नीचे की जगह को सार्वजनिक कला और संस्कृति के लिए समर्पित किया है। रायपुर के स्काई वॉक को स्थानीय कलाकारों, छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति, आदिवासी कलाओं और ऐतिहासिक स्थलों से जुड़ी थीम पर रंगा जा सकता है। इससे यह स्थान युवाओं, पर्यटकों और आम नागरिकों के आकर्षण का केंद्र बन सकता है।
दूसरा, इसे एक ग्रीन वॉकवे या अर्बन गार्डन में बदला जा सकता है। इस संरचना पर वर्टिकल गार्डन, ऑक्सीजन पथ या पौधों से सजाए गए गलियारे बनाए जा सकते हैं। इससे यह एक पर्यावरण मित्र “ग्रीन जोन” बन सकता है, जहाँ लोग सुबह-शाम वॉक के साथ-साथ प्राकृतिक हरियाली का भी अनुभव कर सकें। यह शहर की गर्मी और प्रदूषण को भी कम करने में सहायक होगा।
तीसरा, यह एक हेरिटेज ट्रेल या रायपुर दर्शन पथ के रूप में भी इस्तेमाल हो सकता है, जिसमें दीवारों और कियोस्क पर रायपुर और छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक, धार्मिक, साहित्यिक और राजनीतिक विरासत की झलक दी जाए। यह बच्चों, छात्रों और पर्यटकों के लिए एक जीवंत ज्ञान गैलरी बन सकता है।
चौथा, इसके कुछ खंडों को लोक प्रदर्शन स्थल या “शिल्प मार्केट” के रूप में प्रयोग किया जा सकता है, जहाँ स्थानीय शिल्प, बांस,काष्ठ कला, हैंडलूम और हस्तशिल्प के अस्थायी स्टॉल्स लगाए जाएँ। इससे ग्रामीण कारीगरों को मंच मिलेगा और यह स्काई वॉक आर्थिक रूप से उपयोगी हो सकता है।
इसमें डिजिटल और तकनीकी प्रयोग की भी संभावनाएँ हैं – जैसे वाई-फाई, इन्फो कियोस्क, सौर ऊर्जा से जलने वाली लाइटें, सीसीटीवी और मोबाइल चार्जिंग स्टेशन जैसी सुविधाएँ देकर इसे “स्मार्ट वॉकवे” में बदला जा सकता है।
- रायपुर के स्काई वॉक को यदि नई सोच, स्थानीय जुड़ाव और नवाचार के साथ पुनर्परिभाषित किया जाए, तो यह विकास का नमूना भी बन सकता है और शहरी योजनाओं की सीख भी। जरूरत सिर्फ इतनी है कि शहर की नब्ज समझकर फैसले किए जाएं, ऊँचाई से नहीं, जमीन से जुड़कर।