हस्ताक्षर न्यूज. सैंट पॉल स्कूल के 1980 बैच के पास आउट आलोक अराधे को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बनाए जाने की सिफारिश कॉलेजियम सिस्टम ने की है। संभवतः दो महीने के भीतर वर्तमान में बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस आलोक अराधे सुप्रीम कोर्ट जस्टिस बन जाएंगे।
बात यहां आलोक अराधे की नहीं है, वर्तमान स्कूली सिस्टम की है। आलोक अराधे जब सेंट पॉल स्कूल से 11वीं पास हुए तब स्कूल की फीस महज 8 रुपए 25 पैसे के करीब रही होगी। आज स्कूलों की जिस तरह से फीस हो गई है पढ़ाई का ढर्रा भगवान ही मालिक है। कई स्कूलों में टीचर क्वालिफाइड नहीं हैं। शिक्षा का स्तर महंगे स्कूलों में गिरता ही जा रहा है। अब सोचने वाली बात यह है कि आखिर स्कूली सिस्टम किस तरह से दुरुस्त हो कि आज इन महंगे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का स्तर किस तरह से ऊपर उठे….
अंततः अटकलों, कयासों और अफवाहों का दौर हुआ खत्म
लगभग एक साल से इस बात को लेकर राज्यभर में चर्चा और कयासों का दौर था कि आखिर विष्णुदेव साय की सरकार में कौन तीन विधायक मंत्री बनेंगे। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आखिरकार पौने दो साल बाद अटकलों, कयासों और अफवाहों का दौर पर पूरी तरह से पूर्ण विराम लगा दिया।
अंबिकापुर के विधायक राजेश अग्रवाल, आरंग के विधायक गुरू खुशवंत साहेब और दुर्ग के विधायक गजेन्द्र यादव को विष्णुदेव साय ने अपनी टीम में शामिल कर लिया। खुशवंत साहेब और राजेश अग्रवाल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे। बीजेपी की पिछले कुछ सालों में यह सबसे बड़ी खासियत रही है कि वह कांग्रेस से आए लोगों को सीधा मंत्री पद दे देती है। भाजपा के पुराने चेहरे इसका विरोध भी नहीं करते हैं। यह बात अगर केन्द्र में देखी जाए तो कांग्रेस छोड़कर गए ज्योतिरादित्य सिंधिया पर भी लागू होती है। उन्हें भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी कैबिनेट में जगह दी, सिविल एविएशन मिनिस्टर बना दिया। लगभग यही फार्मूला बीजेपी अमूमन हर राज्य में कर रही है। देखने वाली बात यह है कि जो पुराने चेहरे हैं जैसे अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, अजय चंद्राकर कुछ हद तक बृजमोहन अग्रवाल इनके खेमे के लोग किस तरह से भविष्य में रिएक्ट करते हैं। भाजपा और कांग्रेस में यह अंतर है कि बीजेपी में तत्काल असंतोष नहीं दिखता, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में तत्काल असंतोष दिखता है। अगर इसी तरह के नए चेहरे कांग्रेस की सरकार में शामिल किए जाते तो संभवतः कांग्रेस भवन मेंं तोड़फोड़ और आगजनी तक हो सकती थी मगर भाजपा में किसी तरह का कोई असंतोष तत्कालिक रूप से नजर नहीं आया। असंतोष तो है मगर नजर नहीं आ रहा। हो सकता है 2028 के चुनाव में यह असंतोष अचानक उभर कर आए…
– निश्चय विभु कुमार